रविवार, 28 मई 2017

केदारनाथ यात्रा: तीसरा दिन - गौरीकुंड से केदारनाथ

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2 मई, दिन मंगलवार 
सुबह छहः बजे से पहले ही मेरी आंख खुल गयी। आंख क्या खुली बल्कि रात भर ठीक से नींद ही नहीं आयी थी। मेरे बराबर में विकास तो दूसरी ओर मोनू के बगल में "पंडत" रात भर जम के खर्रांटे मारते रहे थे। मेरे साथ ये एक दिक्कत है कि अगर बगल में कोई खर्रांटे ले रहा हो तो मुझे नींद नही आती। और मुझे क्या शायद किसी को भी नहीं आती होगी। सुबह मेरे बाद मोनू उठा। उसका भी कुछ मेरे जैसा ही हाल था। फिर "पंडत" और विकास को जगाया गया। जब उन दोनों को उनके खर्रांटों के बारे में बताया तो पट्ठे मानने को तैयार नही कि वो खर्रांटे ले रहे थे, बोले कि यार हमें नी पता। खैर सबसे पहले मैं ही रजाई से बाहर निकला और फ्रैश होकर बाहर छत पर आ गया। रात को ये होटल यात्रियों से पूरा भर गया था मगर अब कुछ लोग हमारे जागने से पहले ही केदारनाथ के लिए कूच कर चुके थे। मैं बस बाहर टहल ही रहा था कि मैंने देखा कुछ लोग नीचे कहीं से नहाकर आ रहे हैं। उनसे पूछा तो पता चला कि तप्त कुंड के पास एक-दो पाइप से गर्म पानी आ रहा है। हाँलाकि मैं नहाने के मामले में थोडा कंजूस हूँ और यहाँ तो वैसे भी अच्छी ठंड थी। मगर मैं दो दिन से नहाया नही था और आगे भी एक दो दिन नहाने का कोई मतलब नही था। इसलिए मैं तुरंत अंदर आया और अपने साथियों को अपने इस साहसी विचार से अवगत कराया। लेकिन उन तीनों में से कोई भी नहाने के मूड में नही था। मैंने बोला कोई नी, तुम लोग जल्दी तैयार हो लो तब तक मैं नहा के आता हूँ, फिर जल्दी से निकलेंगे। तप्त कुंड के पास दो जगह पाइप में से गर्म पानी आ रहा था। पानी अच्छा खासा गर्म था, गात सा खुल गया नहाकर ! नाश्ते में एक-एक आलू का परांठा चाय के साथ निपटाकर करीब पौने आठ बजे हमनें अपनी केदारनाथ पैदल यात्रा शुरू कर दी। अभी तक डोली यहाँ से नही चली थी।

गौरीकुंड से केदारनाथ का पैदल ट्रैक करीब सोलह किलोमीटर का है और पूरा रास्ता पैदल चलने लायक पक्का बना हुआ है। 2013 से पहले ये रास्ता चौदह किलोमीटर का था और मंदाकिनी के बांयी ओर से जाता था। गौरीकुंड से केदारनाथ के आधे रास्ते में यानी सात किलोमीटर पर रामबाडा आता था जो इस पैदल यात्रा का सबसे मुख्य पडाव था। 2013 की त्रासदी में रामबाडा पूरी तरह से तबाह हो गया तो प्रशासन ने 2014 में एक नया रास्ता बनाया जो रामबाडा से थोडा पहले मंदाकिनी पार करके नदी के दांयी ओर वाली पहाडी के उपर से होता हुआ जाता है और 2014 के बाद से केदारनाथ का मुख्य रूट है।

गौरीकुंड - भीमबली - छोटी लिंचोली - लिंचोली - छानी केम्प - रुद्रा प्वाइंट - बेस केम्प - केदारनाथ

यात्रा के शुरुआती दिनों में ही बहुत ज्यादा भीड दिखायी दे रही थी। पूरे रास्ते पर यात्री ही यात्री दिखाई पड रहे थे।अधिकतर लोग पैदल थे तो काफी लोग खच्चरों पर और कोई-कोई कंडी में भी जाता दिख रहा था। शुरू में हम चारों साथ - साथ चल रहे थे। मगर जल्द ही एक साथ चलना मुश्किल होने लगा। जहाँ मोनू सबसे तेज चल रहा था वहीं "पंडत" सबसे पीछे था। बार-बार मोनू हमें तेज चलने को बोलता मगर हम सब अपनी - अपनी चाल से ही चल सकते थे। और सही भी यही था। एक-दो किलोमीटर के बाद ही हम सबको ये कहानी समझ में आ गयी। तभी तो मोनू सबसे आगे चला गया और हम तीनों अपनी-अपनी स्पीड से चलने लगे। रास्ते में बहुत से साधू लोग मिले इनमें से एक साधू डमरू बजाते हुए चल रहे थे, उनके पास खडे होकर फोटो खिंचाया। हम लोगों ने अपना टारगेट बनाया की छह किलोमीटर दूर भीमबली में ही पहला स्टॉप लेंगे और वहां 15-20 मिनट रुक कर चलेंगे। भीमबली तक का पूरा रास्ता हल्की - हल्की चढाई वाला ही है। आराम से चलते हुए भी करीब सवा दो घंटे में हम भीमबली पहुंच गये।

भीमबली की समुद्र तल से उंचाई 2670 मीटर है। मोनू हमें यहाँ नही मिला, न जाने वो यहाँ रुका भी था या नही। भीमबली में 10-15 मिनट का ब्रेक लेकर हम लोग आगे निकल गये।  रामबाडा से थोडा पहले दो जगहों पर रास्ता मंदाकिनी नदी को पार कर रहा था। पहले वाले पुल से जाने वाला रास्ता थोडा लम्बा था जबकि दूसरे पुल वाला रास्ता थोडा छोटा था मगर उस पर तेज चढाई थी। हमने छोटे रास्ते से जाने का विचार किया। पुल पर दो-चार फोटो खींचकर चढाई वाले रास्ते पर मैंने अपने कदम बढा दिये। विकास और "पंडत" पुल पर थोडा और आराम करना चाहते थे जबकि मोनू कब का आगे निकल चुका था। यहाँ से छोटा लिंचोली करीब डेढ-पौने दो किलोमीटर है और वहां तक चढाई वाला रास्ता है। अब मुझे भूख भी लगने लगी थी। अपनी चाल से चलता हुआ करीब ग्यारह बजे तक मैं छोटी लिंचोली पहुंच गया। यहाँ दूर से ही एक चबूतरे पर मुझे मोनू बैठा दिख गया। भूख जोरों पर थी जाते ही बिस्किट और कोल्ड-ड्रिंक ले ली गयी। 10-15 मिनट के बाद "पंडत" और विकास भी आ गये। जब हम चारों यहाँ बैठकर खा पी रहे थे तब जाकर केदारबाबा की डोली नीचे से आयी। थोडी देर यहाँ रुककर डोली आगे निकल गयी जबकि हम थोडा और रुककर चले।

करीब पौने बारह बज रहे थे जब हम छोटी लिनचोली से चले। यहाँ से लिनचोली करीब ढाई किलोमीटर जबकि केदारनाथ साढे सात किलोमीटर है। विकास और मोनू ने अपना सामान एक ही बैग में रख रखा था जिसे गौरीकुंड से यहाँ तक मोनू लेकर आया था। अब उस बैग को ढोने की बारी विकास की थी जबकि मैं और "पंडत" अपना-अपना बैग लिए हुए थे। छोटी लिनचोली से निकलते ही मैं और मोनू आगे निकल गये। विकास और "पंडत" को बोल दिया कि आगे कहीं किसी पडाव पर हम उनको मिलेंगे। एक बजे के करीब लिनचोली पहुंचे। ज्यादा देर यहाँ रुके नही। एक किलोमीटर आगे छानी कैम्प में रुके। एक दुकान पर चाय मैगी का ऑर्डर दे दिया। और दुकान के बाहर आकर बैठ गये ताकि विकास और "पंडत" आयें तो हम उन्हे यहीं रोक लें। हमनें अपनी मैगी और चाय निपटा ली तब जाकर विकास और "पंडत" यहाँ पहुंचे। उन दोनो के लिए चाय - मैगी का ऑर्डर देकर मैं और मोनू आगे के लिए निकल लिये ताकि हम जल्दी पहुंचकर आज के रहने खाने का कुछ इंतजाम कर सकें।

छानी कैम्प के बाद जगह-जगह पानी के रास्तों में बर्फ मिलने लगी। एक जगह तो अभी भी मजदूर बरफ हटाकर रास्ता बना रहे थे। छानी कैम्प से रुद्रा प्वाइंट और आगे केदारनाथ बेस कैम्प तक का रास्ता चढाई भरा है। जैसे - जैसे हम आगे बढते जा रहे थे, बर्फ से ढंके पहाड हमारे और करीब आ रहे थे। आंखिर की एक किलोमीटर वाली चढाई काफी कठिन थी मगर फिर भी धीरे-2 हम बेस कैम्प तक पहुंच ही गये। यहाँ के बाद केदारनाथ लगभग एक किलोमीटर रह जाता है और रास्ता भी सीधा ही है। खच्चर सिर्फ बेस कैम्प तक ही आते हैं। इसके बाद सभी को केदारनाथ तक पैदल ही जाना होता है। इन खच्चरों ने रास्ते भर बडा परेशान किया था, वो तो भला हो "सुलभ" वालों का जो पूरे रास्ते पर सफाई कर रहे थे नही तो पूरा रास्ता इन खच्चरों की लीद से पट जाता। अब कम से कम कल तक के लिए इन खच्चरों से पीछा छूटा। बेस कैम्प से केदारनाथ सामने ही दिखता है, ये देखकर हमारी थकान कुछ मिट सी गयी। अब हल्की-हल्की बूंदा बांदी भी होने लगी थी मगर फिर भी हम लोग रुके नही और शाम के चार बजने से पहले ही केदारनाथ पहुंच गये। यहाँ पहुंचते ही हमारा सबसे पहला काम था रहने के लिए जगह ढूंढना जिसके लिए हमें बहुत ज्यादा मेहनत नही करनी पडी। केदारनाथ मंदिर से करीब 150-200 मीटर पहले ही जीएमवीएन वालों ने एक पूरी टेंट कॉलोनी बसा रखी थी। एक टेंट में 10 आदमियों के रुकने की व्यवस्था थी और किराया था 250 रुपये प्रति व्यक्ति जो शायद थोडा ज्यादा था। मगर ज्यादा ऑप्शन ना होने की वजह से एक टेंट में चार लोगों के हिसाब से पर्ची कटाई गयी और जा पटका अपना बैग।

करीब 20-25 मिनट के बाद "पंडत" और विकास आते हुए दिखे, उनके लिए मैं और मोनू पहले ही टेंट के बाहर आ गये थे। हम चारों जैसे ही अपने आज के आशियाने में पहुंचे तो सबसे पहला काम जूते निकालकर स्लीपिंग बैग में घुसने का ही किया गया। हाँलाकि अभी दिन छिपनें में काफी समय था मगर बाहर बादल होने की वजह से मौसम में बेहद ठंड थी उपर से हमारे शरीर में आया पसीना सूख रहा था तो और भी ज्यादा ठंड लग रही थी। स्लीपिंग बैग में घुसने के भी करीब 15-20 मिनट बाद ठंड दूर हुई। आंखिर आज अपनी 16 किलोमीटर की पैदल यात्रा 8 घंटे में पूरी करके हम समुद्र तल से करीब 3500 मीटर की उंचाई पर स्थित इस केदारनगरी में पहुंच गये। सभी को हल्के सर दर्द की शिकायत सी  महसूस हो रही थी जो शायद हाई एल्टिट्यूड का असर था। अब करना तो कुछ था नही तो बस अंधेरा होने तक पडे रहे टेंट में ही। दो-तीन घंटे बाद करीब साढे सात बजे बाहर थोडा बहुत टहलकर और हल्का-फुल्का डिनर कर के हम लोग फिर से अपने टेंट में सोने के लिए चले गये। आज का दिन पूरा हुआ बस अब सुबह भोले बाबा के दर्शन करने की बारी थी।

मंदाकिनी और गौरीकुंड से पैदल यात्रा की शुरूआत

इस फोटो में जो सबसे पीछे भीड सी दिख रही है, वहीं गौरीकुंड का अंतिम छोर है जहाँ से केदारनाथ की पैदल यात्रा शुरू हो रही है।

मोनू और विकास

बम बम भोले - ये डमरू वाले साधू जी डमरू बजाते और भोलेनाथ का जयकारा करते चल रहे थे। "पंडत" आशीर्वाद ले रहा है।

अब चौधरी साब की बारी आशीर्वाद लेने की

भीमबली से करीब एक -डेढ किलोमीटर पहले मिला एक झरना

लो जी, भीमबली में वाइ-फाइ जोन भी है। इसे कहते हैं हाइटेक जमाने की केदारनाथ यात्रा !!

भीमबली से दूरियां
क्या कहेंगे विकास के इस पोज को!!

"पंडत" अब थोडा ठीक सा लग रहा है। शुरू के चार-पांच किलोमीटर में तो ये बुरी तरह टूट लिया था।

रामबाडा से थोडा पहले मंदाकिनी पार कर दूसरी ओर जाता रास्ता। यहाँ करीब 100-150 मीटर की दूरी पर दो जगह मंदाकिनी नदी पर पुल बने हैं और उनसे होकर केदारनाथ ट्रैक नदी के दायीं ओर वाली पहाडी पर जाता है।

रामबाडा के पास मंदाकिनी पर बना पुल

यहीं पर कहीं रामबाडा था जो 2013 में पूरी तरह तबाह हो गया था।

रामबाडा के पास नदी पार करने के बाद उपर चढता रास्ता

दुख के दो साथी

बर्फ के गोले दिखाता विकास

लिंचोली के बाद मिली पहली बर्फ पर चौधरी साब

रास्ते में मिली पहली बर्फ पर मोनू

लिंचोली से दूरियां

छानी कैम्प के बाद एक जगह बर्फ हटाकर रास्ता बनाते मजदूर



मंदाकिनी के उस पार पुराना क्षतिग्रस्त केदारनाथ ट्रैक और उस पर हुआ भूस्खलन

मुस्कुरायें आप हिमालय की गोद में हैं। मगर ऐसी थकान में मुस्कुरायें कैसे भाई?!!

केदारनगरी स्थित टेंट्स
शाम के सवा चार बजे हैं। विकास और "पंडत" भी आ पहुंचे हैं केदारनगरी!
जीएमवीएन के टेंट में अपने-2 स्लीपिंग बैग में घुसे हुए

अगले दिन सुबह केदार बाबा के दर्शन के पश्चात
अगले भाग में जारी.....

5 टिप्‍पणियां:

  1. Very nice. .... & true story...love you so much dear. ...

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  2. भाई आपकी लिखने की कला के तो दिवाने हो गये

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  3. केदार हादसे के बाद तो यहाँ बहुत कुछ बदल गया है, हादसे से पहले कई बार यहाँ गया हूँ, बाद में जाना नहीं हो पाया है।

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    1. जी बडे भाई, अब तो लगभग सभी कुछ बदल गया है। टिप्पणी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद। काफी समय से आपको पढता आ रहा हूँ। इच्छा है कभी आपके साथ घुम्मकडी का मौका मिले।

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